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इमरोज़ ने कहा- कद्र करना, जानना और फना होने का जज़्बा है प्रेम

अलका अमृता इमरोज मुंबई से.इमरोज़ ने लेख ‘मुझे फिर मिलेगी अमृता’ में लिखा कि कोई भी रिश्ता बांधने से नहीं बंधता। किसी बात को लेकर हम कभी एक-दूसरे से नाराज़ तक नहीं हुए। इसके पीछे एक ही वजह रही कि वह भी अपने आप में हर तरह से आजाद रहीं और मैं भी हर स्तर पर आजाद रहा। चूंकि हम दोनों कभी पति-पत्नी की तरह नहीं रहे, बल्कि दोस्त की तरह रहे। हमारे बीच कभी यह लफ्ज भी नहीं आया कि आई लव यू। न तो मैंने कभी अमृता से कहा कि मैं तुम्हें प्यार करता हूं और न ही अमृता ने कभी मुझसे। जब 2005 में अमृता ने दुनिया छोड़ी तो इमरोज़ ने लिखा-‘उसने जिस्म छोड़ा है, साथ नहीं। वो अब भी मिलती है, कभी तारों की छांव में, कभी बादलों की छांव में, कभी किरणों की रोशनी में कभी ख्यालों के उजाले में, हम उसी तरह मिलकर चलते हैं चुपचाप, हमें चलते हुए देखकर फूल हमें बुला लेते हैं, हम फूलों के घेरे में बैठकर एक-दूसरे को अपना-अपना कलाम सुनाते हैं उसने जिस्म छोड़ा है साथ नहीं…’।


दिल्ली में रहते थे तो आसपास के पंजाबी परिवार मिलजुल कर लोहड़ी मनाते थे। बाऊ जी को खास रूप से बुलाया जाता। लोहड़ी पर भी वह लोगों को अपनी नज़्में व अमृता के साथ बिताए पलों के बारे में बताना नहीं भूलते थे। इस बार परिवार मुंबई में है, लेकिन हमारे परिवार में इसे पहले की ही तरह सेलिब्रेट किया जाएगा।


आज अमृता नहीं हैं और 93 साल के बाऊ जी (इमरोज) सेहत के हिसाब से ठीक नहीं रहते। मैं और मेरे पति नवराज क्वात्रा बच्चों के साथ मुंबई में रह रहे हैं। चूंकि सर्दियों का मौसम है इसलिए उनका खास ख्याल रखना पड़ता है। सेहत ठीक न होने के बावजूद उनके भीतर अभी भी वह फन जो अमृता जी के दौर में था उनकी रगों और सांसों तक में नजर आता है। बाऊ जी पेंटिंग्स अपनी खुशी के लिए बनाते थे। अमृता जी के जाने के बाद कमरे से सारा सामान हटा दिया गया है। बस पेंटिंग्स लगा दी गई हैं। इससे उन्हें खुशी मिलती है। बाऊ जी ने अमृता जी को लेखिका के रूप में नहीं बल्कि एक सीधी-सादी अच्छी इंसान के रूप में चाहा। इमरोज़ जी आज जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर हैं लेकिन उनकी कल्पना शक्ति चाहे पेंटिंग्स में हो या फिर लेखन में अक्सर नजर आ जाती है। बैठते हैं तो कुछ न कुछ कागजों पर उकेरते रहते हैं, जिनमें अमृता की महक और अक्स आज भी ताजा हैं। मुझे वह दिन याद है जब अमृता जी की तबीयत खराब थी। आने वाले पूछते थे- तबीयत खराब है क्या? वह कहते- नहीं। दरख़्त अब बीज बन रहा है। इसे उन्होंने अपनी एक कविता में लिखा है- कल तक जो एक दरख़्त था, महक, फूल और फलों वाला, आज का एक ज़िक्र है वह, जिंदा जिक्र है, दरख़्त जब बीज बन गया है, हवा के साथ उड़ गया है, किस तरफ अब पता नहीं। उसका अहसास है मेरे साथ...।



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इमरोज़ के साथ अलका अमृता।


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