गेहूं की फसल कटने के बाद बची नाड़ में लगाई जाने वाली आग दूसरी फसलों और पर्यावरण को ही नहीं प्रभावित करती, बल्कि इसकी चपेट में मधुमक्खी पालन उद्योग भी आ जाता है। मधुमक्खी पालक बचाव के तरीके इस्तेमाल करने के साथ गांव-गांव जाकर किसानों को भी नाड़ न जलाने के लिए जागरूक कर रहे हैं। पिछले साल भी मधुमक्खी पालकों का काफी नुकसान हुआथा। मधुमक्खी पालक अमरदीप सिंह ने बताया कि गत साल दर्जनभर के करीब पालकों के सैकड़ों डिब्बे जलकर राख हो गए थे और लाखों मधुमक्खियां मर गई थीं।
मधुमक्खी पालकों की मानें तो पहले चाइना से आने वाला नकली शहद उनके उद्योग को प्रभावित करता रहा, लेकिन इस बार कोरोना के चलते चाइना का माल आना बंद हो गया है। मगर कर्फ्यू के चलते वह लोग दूसरे राज्यों और जिलों में नहीं जा सकते हैं, इसलिए उनकी मजबूरी बन गई है कि वह अपने आसपास ही डिब्बे लगा रहे हैं। ऐसे में नाड़ में लगाई जाने वाली आग उनके लिए सबसे बड़ा खतरा बनी है। गांव जेठूवाल के मधुमक्खी पालक पवनदीप अरोड़ा ने बताया कि जिले में 300 छोटे बड़े मधुमक्खी पालक हैं और तकरीबन 25000 डिब्बे इस कारोबार से जुड़े हुए हैं। मधुमक्खी पालकों ने जिला प्रशासन तथा खेतीबाड़ी विभाग से अपील की कि वह नाड़ न जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए सख्त कदम उठाएं।
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